Saturday, 27 August 2011

अनाम !


दिल का चाहते हुए भी ना चाहना..
कलम का लिखते लिखते रुक जाना...
आज मैंने जान लिया.क्या होता है..
ना चाहते हुए भी होंसलों का टूट जाना...

फिर भी मुझे झुकना नहीं..रुकना नहीं..
आगे बढ़ते जाना है...
अपने कर्म को कर्मठता से करते जाना है...
अपने किये वादे को सचे मन से निभाना है!!!.

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